लम्हा
आज एक लम्हा गुजरा खामोशियोंको लेकर खामोशिया थी... फिर भी मन की बुलंद आवाज़ कुछ कहा करती थीं तआकूब करना था उस मंज़िल को जो ख़्वाबोंमे भी आती थी मुसाफ़िर की सफर ने सब्र करने का फैसला लिया था कठिनाईयां बहुत थी लेकिन हौसला नही हारा था इन्तजार था उसी लम्हे का जिसकी दिलसे गुज़ारिश थी जो दिल चाहा वो पाने की उसी खामोशियोंमें ताकद थी - गौरी अजय चिंदरकर ०१/०८/२०१८